भारत में स्कूली शिक्षा को एक नई दिशा देने वाला बड़ा कदम उठाते हुए, सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) ने कक्षा 6 से 8 तक के छात्रों के लिए कोडिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और साइबरसिक्योरिटी को पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रस्ताव रखा है। यह पहल देशभर के बच्चों को तकनीकी कौशल से लैस करने की एक महत्वाकांक्षी योजना मानी जा रही है।
सीबीएसई के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, यह कदम डिजिटल साक्षरता को उतना ही महत्वपूर्ण मानता है जितना कि गणित या विज्ञान को। अब तक कोडिंग सीमित छात्रों या चुनिंदा स्कूलों की पाठ्येतर गतिविधि मानी जाती थी, लेकिन इस प्रस्ताव के तहत इसे मुख्यधारा का विषय बनाया जाएगा।
जरूरत के मुताबिक तैयार किया गया पाठ्यक्रम
इस प्रस्तावित पाठ्यक्रम में कक्षा 6 से छात्रों को ब्लॉक-बेस्ड कोडिंग प्लेटफॉर्म्स (जैसे स्क्रैच) से परिचित कराया जाएगा। कक्षा 8 तक छात्र टेक्स्ट-बेस्ड प्रोग्रामिंग लैंग्वेज (जैसे पाइथन और जावास्क्रिप्ट) की बुनियादी समझ हासिल करेंगे। इसके अलावा, AI के मूल सिद्धांत, मशीन लर्निंग की बुनियादी अवधारणाएं और नैतिक पहलुओं पर भी उन्हें पढ़ाया जाएगा।
“आज के समय में डिजिटल साक्षरता पढ़ना-लिखना जितनी ही जरूरी हो गई है,” पाठ्यक्रम की रुपरेखा तैयार करने में शामिल डॉ. अनुराधा शर्मा ने कहा। “हम केवल कोडिंग सिखा नहीं रहे हैं, बल्कि यह भी बता रहे हैं कि तकनीक हमारे समाज और भविष्य के करियर को कैसे बदल रही है।”
प्रोजेक्ट-बेस्ड शिक्षा और व्यावहारिक अनुभव
पाठ्यक्रम को पूरी तरह से इंटरैक्टिव और प्रोजेक्ट-बेस्ड बनाया जाएगा। कक्षा 6 के छात्र एनिमेशन प्रोजेक्ट बनाएंगे, जबकि कक्षा 8 के बच्चे बेसिक चैटबॉट या वेबसाइट तैयार करने का अभ्यास करेंगे। इसके लिए शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि वे आत्मविश्वास से कक्षाओं में कोडिंग पढ़ा सकें।
इसके अलावा, पाठ्यक्रम में डिजिटल नागरिकता (डिजिटल सिटीजनशिप) पर विशेष जोर रहेगा। छात्र डेटा प्राइवेसी, साइबरबुलिंग से बचाव और जिम्मेदार ऑनलाइन व्यवहार के बारे में भी जानेंगे। अधिकारियों का मानना है कि यह संतुलित दृष्टिकोण उन्हें सुरक्षित और जागरूक डिजिटल नागरिक बनाने में मदद करेगा।
शहरी-ग्रामीण अंतर को पाटने की कोशिश
सबसे बड़ी चुनौती देश के ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के स्कूलों तक यह सुविधा पहुंचाने की होगी। सीबीएसई इस संबंध में राज्य सरकारों और तकनीकी कंपनियों से साझेदारी पर काम कर रहा है, ताकि सस्ती डिवाइस, इंटरनेट कनेक्शन और शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था हो सके।
“शहरों के स्कूलों में कोडिंग क्लब और AI कार्यशालाएं पहले से हो रही हैं। हमारा लक्ष्य है कि गांव के बच्चे भी इस डिजिटल क्रांति का हिस्सा बनें,” सीबीएसई कार्यान्वयन समिति के सदस्य राजेश सिन्हा ने कहा।
उद्योग और माता-पिता की प्रतिक्रिया
भारत के आईटी उद्योग ने इस घोषणा का स्वागत किया है। नैसकॉम ने इसे “दूरदर्शी कदम” बताया, जो आने वाली पीढ़ियों में इनोवेशन और उद्यमिता की भावना पैदा करेगा। कई एडटेक स्टार्टअप इस मौके को देखते हुए पाठ्यक्रम के अनुकूल सामग्री तैयार करने में जुट गए हैं।
हालांकि, कुछ माता-पिता इस बदलाव को लेकर चिंतित हैं। दिल्ली की एक अभिभावक अंजलि वर्मा ने कहा, “मेरी बेटी अभी 11 साल की है। मैं चाहती हूं कि वह बचपन का आनंद ले, उसे स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने का दबाव न हो।”
सीबीएसई अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि पाठ्यक्रम आयु-उपयुक्त और संतुलित होगा, जिसमें अन्य विषयों और खेल-कूद के लिए भी पर्याप्त समय रहेगा।
दूसरे बोर्डों के लिए मिसाल?
शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि सीबीएसई का यह कदम अन्य बोर्डों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है।
“सीबीएसई ने हमेशा पाठ्यक्रम में नवाचार की पहल की है,” शिक्षा नीति विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण अग्रवाल ने कहा। “अगर यह योजना सफल होती है, तो यह पूरे देश में डिजिटल शिक्षा की नई लहर पैदा कर सकती है।”
आगे की राह
फिलहाल यह प्रस्ताव शिक्षकों, प्रिंसिपलों और अभिभावकों की प्रतिक्रिया के लिए सार्वजनिक किया गया है। इस शैक्षणिक सत्र के अंत तक अंतिम पाठ्यक्रम तैयार करने की योजना है, और अगले सत्र से पायलट प्रोग्राम की शुरुआत की जाएगी।
अगर सब कुछ योजना के मुताबिक हुआ, तो जल्द ही देशभर के लाखों छात्र गणित और हिंदी के साथ-साथ कोडिंग, साइबरसिक्योरिटी और AI भी पढ़ते नजर आएंगे।
इस डिजिटल युग में सीबीएसई का यह कदम भारतीय शिक्षा की दिशा बदलने वाला साबित हो सकता है — जहां कक्षाएं केवल किताबी ज्ञान नहीं बल्कि नए जमाने के डिजिटल कौशल का केंद्र बनेंगी।